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Lord Hanuman Janmotsav Special – Yesmywish.com !

Shree Hanuman Janmotsav

2018 में लोगों के द्वारा हनुमान जयंती 31 मार्च, दिन शनिवार को मनाया जाएगा।

हनुमान जयंती को कब और कैसे मनाते हैं

प्रभु श्री हनुमान, भगवान श्री राम के बहुत बड़े भक्त, पूरे भारत में हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा प्रभु श्री राम में अपनी गहरी आस्था के कारण पूजे जाते हैं। हनुमान जयंती के दिन पर, सभी हनुमान मंदिरों में बहुत अधिक भीड़ हो जाती है, हनुमान जयंती हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा हिन्दूओं के एक महत्वपूर्ण त्योहार के रुप में बड़े उत्साह और जोश के साथ मनाई जाती है। यह एक महान हिन्दू उत्सव है, जो सांस्कृतिक और परंपरागत तरीके से मनाया जाता है।

लोग हनुमान भगवान की पूजा आस्था, जादूई शक्तियों, ताकत और ऊर्जा के प्रतीक के रुप में करते हैं। लोग हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, क्योंकि यह बुरी शक्तियों का विनाश करने और मन को शान्ति प्रदान करने की क्षमता रखती है। इस दिन हनुमान भक्त सुबह जल्दी नहाने के बाद भगवान हनुमान जी के मंदिर जाते हैं और हनुमान जी की मूर्ति पर लाल सिंदूर (का चोला) चढ़ाते हैं, हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, लड्डू का प्रसाद चढ़ाते हैं, मंत्रों का जाप करते हुए आरती करते हैं, मंदिर की परिक्रमा आदि बहुत सारी रस्में करते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि, हनुमान जी का जन्म वानर समुदाय में लाला-नारंगी शरीर के साथ हुआ था, इसी कारण, सभी हनुमान मंदिरों में लाल-नारंगी रंग की हनुमान जी की मूर्ति होती है। पूजा के बाद, लोग अपने मस्तिष्क (माथे) पर प्रसाद के रुप में लाल सिंदूर को लगाते हैं और भगवान हनुमान जी से माँगी गई अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए लोगों को लड्डू के प्रसा का वितरण करते हैं।

महाराष्ट्र में, यह हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने की पूर्णिमा को मनाया जाती है। यद्यपि, अन्य हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, यह अश्विन माह के अंधेरे पक्ष में 14वें दिन पड़ती है। पूजा के बाद, पूरा आशीर्वाद पाने के लिए लोगों में प्रसाद बाँटा जाता है।

तमिलानाडु और केरल में, यह मार्गशीर्ष माह (दिसम्बर और जनवरी के बीच में) में, इस विश्वास के साथ मनाई जाती है कि, भगवान हनुमान इस महीने की अमावश्या को पैदा हुए थे। उड़ीसा में, यह वैशाख (अप्रैल) महीने के पहले दिन मनाई जाती है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में यह वैशाख महीने केक 10वें दिन मनाई जाती है, जो चैत्र पूर्णिमा से शुरु होती है और वैशाख महीने के 10वें दिन कृष्ण पक्ष पर खत्म होती है।

हनुमान जयंती मनाने का महत्व

हनुमान जयंती का समारोह प्रकृति के अद्भुत प्राणी के साथ पूरी हनुमान प्रजाति के सह-अस्तित्व में संतुलन की ओर संकेत करता है। प्रभु हनुमान वानर समुदाय से थे, और हिन्दू धर्म के लोग हनुमान जी को एक दैवीय जीव के रुप में पूजते हैं। यह त्योहार सभी के लिए बहुत अधिक महत्व रखता है, हालांकि ब्रह्मचारी, पहलवान और बलवान इस समारोह की ओर से विशेष रुप से प्रेरित होते हैं। हनुमान जी अपने भक्तों के बीच में बहुत से नामोंसे जाने जाते हैं; जैसे- बजरंगवली, पवनसुत, पवन कुमार, महावीर, बालीबिमा, मारुतसुत, संकट मोचन, अंजनिसुत, मारुति, आदि।

हनुमान अवतार को महान शक्ति, आस्था, भक्ति, ताकत, ज्ञान, दैवीय शक्ति, बहादुरी, बुद्धिमत्ता, निःस्वार्थ सेवा-भावना आदि गुणों के साथ भगवान शिव का 11वाँ रुद्र अवतार माना जाता है। इन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्री राम और माता सीता की भक्ति में लगा दिया और बिना किसी उद्देश्य के कभी भी अपनी शक्तियों का प्रदर्शन नहीं किया। हनुमान भक्त हनुमान जी की प्रार्थना उनके जैसा बल, बुद्धि, ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए करते हैं। इनके भक्तों के द्वारा इनकी पूजा बहुत से तरीकों से की जाती है; कुछ लोग अपने जीवन में शक्ति, प्रसिद्धी, सफलता आदि प्राप्त करने के लिए बहुत समय तक इनके नाम का जाप करने के द्वारा ध्यान करते हैं, वहीं कुछ लोग इस सब के लिए हनुमान चालीसा का जाप करते हैं।

हनुमान जयंती को मनाने के पीछे का इतिहास

एकबार, एक महान संत अंगिरा स्वर्ग के स्वामी, इन्द्र से मिलने के लिए स्वर्ग गए और उनका स्वागत स्वर्ग की अप्सरा, पुंजीक्ष्थला के नृत्य के साथ किया गया। हालांकि, संत को इस तरह के नृत्य में कोई रुचि नहीं थी, उन्होंने उसी स्थान पर उसी समय अपने प्रभु का ध्यान करना शुरु कर दिया। नृत्य के अन्त में, इन्द्र ने उनसे नृत्य के प्रदर्शन के बारे में पूछा। वे उस समय चुप थे और उन्होंने कहा कि, मैं अपने प्रभु के गहरे ध्यान में था, क्योंकि मुझे इस तरह के नृत्य प्रदर्शन में कोई रुचि नहीं है। यह इन्द्र और अप्सरा के लिए बहुत अधिक लज्जा का विषय था; उसने संत को निराश करना शुरु कर दिया और तब अंगिरा ने उसे शाप दिया कि, “देखो! तुमने स्वर्ग से पृथ्वी को नीचा दिखाया है। तुम पर्वतीय क्षेत्र के जंगलों में मादा बंदर के रुप में पैदा हो।”

उसे फिर अपनी गलती का अहसास हुआ और संत से क्षमा याचना की। तब उस संत को उस पर थोड़ी सी दया आई और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि, “प्रभु का एक महान भक्त तुमसे पैदा होगा। वह सदैव परमात्मा की सेवा करेगा।” इसके बाद वह कुंजार (पृथ्वी पर बन्दरों के राजा) की बंटी बनी और उनका विवाह सुमेरु पर्वत के राजा केसरी से हुआ। उन्होंने पाँच दिव्य तत्वों; जैसे- ऋषि अंगिरा का शाप और आशीर्वाद, उसकी पूजा, भगवान शिव का आशीर्वाद, वायु देव का आशीर्वाद और पुत्रश्रेष्ठी यज्ञ से हनुमान को जन्म दिया। यह माना जाता है कि, भगवान शिव ने पृथ्वी पर मनुष्य के रुप पुनर्जन्म 11वें रुद्र अवतार के रुप में हनुमान वनकर जन्म लिया; क्योंकि वे अपने वास्तविक रुप में भगवान श्री राम की सेवा नहीं कर सकते थे।

सभी वानर समुदाय सहित मनुष्यों को बहुत खुशी हुई और महान उत्साह और जोश के साथ नाचकर, गाकर, और बहुत सी अन्य खुशियों वाली गतिविधियों के साथ उनका जन्मदिन मनाया। तब से ही यह दिन, उनके भक्तों के द्वारा उन्हीं की तरह ताकत और बुद्धिमत्ता प्राप्त करने के लिए हनुमान जयंती को मनाया जाता है।

हनुमान मंत्र:

मनोजवं मारुततुल्यवेगम्

जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं

श्री रामदूतं शरणं प्रपद्ये।।

 

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Yesmywish Team

Holi is the day to express love with colors. – Yesmywish.com

Holi, the festival of colours is celebrated at the approach of vernal equinox. It comes on the last full moon day of the lunar month Phalguna (Phalguna Purnima) and marks the end of winter season. As per the Hindu Calendar Holi date varies in Gregorian calendar and usually falls in March and sometimes in late February. It is the first major Hindu festival in Gregorian calendar and for some believers beginning of New Year too.

Holi is also known as festival of love. Hindus believe it is a time to say farewell to winter and to enjoy spring’s lush colours. By tradition it was identified as a festival that celebrated agriculture and commemorated good harvests. The mythologies behind Holi signifies the victory of good over evil, and the day is observed as a time to rid oneself from past errors, end conflicts, forget, forgive and to renew ruptured relationships.

The celebrations start on the night before Holi with Holika bonfire. The next morning, people engage in frolic with colours where they play, chase and colour each other with dry powder and coloured water. They celebrate in groups singing and dancing, and it occurs everywhere viz. streets, parks, outside temples and buildings.
Celebrating the colour of Holi with YesMyWish – Holi – is marked with much fun and fervor throughout the country and other parts of the world. Celebrating the triumph of ‘good’ over ‘bad’, this colorful festival falls on Phalgun Purnima, which falls at the end of February or in early March, as per the Georgian calendar. Songs, water balloons and bright colors are the major highlights of this vivid and lively festival. Bright colored powders, known as ‘Gulal’ are smeared on everyone’s faces accompanied by splashing of colored water. Holi is a special time of year to remember those who are close to our hearts with splashing colors!
Do u wish to celebrate festival with our Family- www. Yesmywish.com fulfill your desires on this Colourful festival.

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Yesmywish Team

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Celebrate the Union of Shiva & Shakti at MahaShivratri Puja

Maha Shivratri is one of the biggest Hindu festivals. This year, Maha Shivaratri will be celebrated on February 13-14, 2018. This festival is considered to be the convergence of Shiva and Shakti. It is believed that on Maha Shivaratri, which is a Chaturdashi Tithi, Lord Shiva married Goddess Parvati. According to the Hindu calendar There are 12 Shivaratris in a year. The term Maha Shivaratri means the ‘Great Night of Shiva’ and falls on the 13th night and 14th day of the New Moon.

It is said that Lord Shiva performs the Tandava nritya or dance on Maha Shivaratri and this is one of the most sacred festivals in India. On this day, devotees try to please Lord Shiva by observing a fast and perform special puja to attain moksha and get rid of their sins. They offer honey, milk and water to the Shiva Linga.

Maha Shivaratri is considered quite auspicious, as married and unmarried females observe fast, perform Shiva Puja and try to please Goddess Parvati as well, who is also known as Gaura. She is the one who is believed to blesses women with a good husband like Lord Shiva and also grants them a long and prosperous married life. This festival is also known as the darkest night of the year and has tremendous significance. On this auspicious festival, we have shared the Maha Shivaratri 2018 Puja Muhurat, Puja Vidhi and other auspicious timings to perform E- Shiva Puja with passion and dedication. If you perfrom puja with us visit our website-www.yesmywish.com fulfills all type of Desires and make a wish with us..

Thanks

Yesmywish Team

Makar Sankranti 2018 – www.Yesmywish.com

Information and Importance of Makar Sankranti

Makar Sankranti, also known as Sankranti or Makara Sankrant, is one of the highly auspicious days in a Hindu calendar and the day is dedicated to the worship of Lord Surya (Sun God). Makar Sankranti 2018 date is January 14. Punyakaal or time for puja and to take holy bath is from 1:56 PM on January 14 to early morning hours of January 15, 2018. Makar Sankranti is the day when the sun enters into the zodiac Capricorn or Makara. It is also known as Uttarayana Punyakalam and heralds the arrival of spring season.

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What is Makar Sankranti?

Makar Sankranti – also Makara Sankranti, Makar Sankrant and Makarasankranti – is an auspicious day based on the movement of the Sun (Surya). ‘Makar’ or ‘Makara’ refers to ‘Makara rashi’ – the zodiac corresponding to Capricorn. ‘Sankranti’ in Sanskrit means ‘to cross into’ or the day when sun enters from one zodiac sign to another. So Makar Sankranti is the day when the sun enters into the zodiac Capricorn. It is also known as Uttarayana Punyakalam or the entry of sun into the Northern Hemisphere. The six-month long Uttarayana begins on this day.

Usually the day of Hindu celebrations vary from year to year in English Calendar. Hindu calendar is based on the movement of the moon and therefore it is a lunar calendar. Hence the change in the date of various celebrations with corresponding English Calendar. But Makarasankranti is based on solar movement and therefore it has almost a fixed date. But depending on the movement of the sun from south to north Makar Sankranti date progresses i.e., a decade ago Makar Sankranti was observed on January 12 and later on 13. Now it is on 14 or 15. In future it will be observed on January 16.

Hindu God Worshipped on Makar Sankranti

Lord Surya is worshipped on the Makar Sankranti day and is a form of Nature Worship. Every living and non-living being merges with the Brahman and Sun is the Pratyaksha-Brahman or the Brahman that can be seen.

How is Makar Sankranti Observed by Hindus?

A major spiritual event on the day is the bathing ritual at Sangam (confluence of Yamuna, Saraswati and Ganga) in Allahabad and also in the famous bathing ghats on River Ganga. Taking a holy dip on the day is considered to cleanse sins committed and this will lead to Moksha (Salvation). Uttarayana Punyakalam, the day time of Devas, begins with the Makar Sankranti and lasts for six months. This period is ideal for all kind of auspicious activities.

Makar Sankranti in Hindu Scriptures – Stories

One of the most important myths is the death of Bhishma Pitamaha in the Mahabharata. Bhishma chose the Uttarayan period. (Bhisma had got a boon from his father that he will only die when he wishes.) It is believed that people who die during Uttarayana merges with the Brahman, thus ending the cycle of rebirth. Legend also has it that Lord Vishnu buried Asuras on this day beneath the Mandara Mountain. It signifies the end of evil and the dawn of righteousness.

Another legend is that King Bhageeratha brought Ganges down into Patala on Makara Sankranti day. This was to get salvation to his ancestors who were cursed by Sage Kapila and turned into ashes. On this day millions of people take bath in the Ganges. Makara Sankranti is also an important bathing date during Kumbh Mela and Magh Mela.

Puranas state that on Makar Sankranti day, Surya visits Lord Shani. In mythology Lord Shani, is the son of Surya.

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Yesmywish Team

Happy Diwali – Yesmywish.com!

This Dewali Perform Laxmi Online Pujas – Yesmywish.com

दिवाली त्यौहार का महत्व Significance of Diwali Festival in Hindi

दिवाली त्यौहार का अध्यात्मिक महत्व सबसे पहले यही है की इस दिन अंधकार पर प्रकश की विषय का दिन माना जाता है। इस दिन को बहुत ही सुन्दर और बड़े पारंपरिक तरीके से धन की देवी, लक्ष्मी और ज्ञान के भगवान, गणेश जी की पूजा की जाती है। हिन्दू महाकाव्य रामायण के अनुसार दिवाली का त्यौहार श्री राम भगवान, माता सीता और लक्ष्मण के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की ख़ुशी में खासकर मनाया जाता है।

भारत के कुछ क्षेत्रों में महाकाव्य महाभारत के अनुसार दिवाली का त्यौहार पांडवों के 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद लौटने की ख़ुशी में भी मनाया जाता है। यह भी माना जाता है कि इस दिन को देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र मंथन करते समय माता लक्ष्मी का जन्म हुआ था। भारत के कुछ पूर्वी और उतारी क्षेत्रों में नव हिंदी वर्ष के रूप में भी मनाया जाता है।

श्री राम के वनवास से अयोध्या लौटने की ख़ुशी में The Return of Shri Ram from Vanvaas to Ayodhya
यह वो कहानी और करण है जो लगभग सभी भारतीय को पता है कि हम दिवाली श्री राम जी के वनवास से लौटने की ख़ुशी में मनाते हैं। मंथरा के गलत विचारों से पीड़ित हो कर भरत की माता कैकई श्री राम को उनके पिता दशरथ से वनवास भेजने के लिए वचनवद्ध कर देते हैं। ऐसे में श्री राम अपने पिता के आदेश को सम्मान मानते हुए माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के वनवास के लिए निकल पड़ते हैं। वहीँ वन में रावण माता सीता को छल से अपहरण कर लेता है।

तब श्री राम सुग्रीव के वानर सेना और प्रभु हनुमान के साथ मिल कर रावण की सेना को परास्त करते हैं और श्री राम रावण का वध करके सीता माता को छुड़ा लाते हैं। उस दिन को दशहरे के रूप में मनाया जाता है और जब श्री राम अपने घर अयोध्या लौटते हैं तो पूरे राज्य के लोग उनके आने के ख़ुशी में रात्री के समय दीप जलाते हैं और खुशियाँ मनाते हैं। तब से उस दिन का नाम दीपावली के नाम से जाना जाता है।

माता लक्ष्मी का अवतार The Incarnation of Goddess Lakshmi

हर बार दीपावली का त्यौहार हिन्दी कैलंडर के अनुसार कार्तिक महीने के “अमावस्या” के दिन मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन समुन्द्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी जी ने सृष्टि में अवतार लिया था। माता लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी माना जाता है। इसीलिए हर घर में दीप जलने के साथ-साथ हम माता लक्ष्मी जी की पूजा भी करतें हैं।

आशा करते हैं आपकी दिवाली पर यह निबंध अच्छा लगा होगा। हम सभी को प्रतिवर्ष दिवाली का उत्सव पर्यावरण की प्राकृतिक सुंदरता को बचाने, स्वछता बनाये रखने और आनंद लेने के लिए मनान चाहिए। आप सभी को दीवापली की हार्दिक शुभकामनायें!

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Shradh 2017: Rest In Peace Our Ancestors – Yesmywish.com

Here, Yesmywish.com presents Shradh 2017 dates are occurring from September 05 to September 19. During Pitru Paksha, the ritual of Tarpan is performed for the departed souls to rest in peace. This Shradh in 2017, let’s ask for the blessings and removal of Pitru Dosh. Know the importance of Shraadh with us.

Perform Shraddh E-PujaYesmywish.com

Shraddh is one of the most significant time to remember our ancestors and pray for the departed souls to rest in peace. As per the Hindu Calendar, during the time of Pitru Paksha, if you offer prayers and perform certain rituals for your ancestors, you will be blessed by them and their souls will rest in peace.

Every year, Tarpan takes place during the time of Shraddh dates. The same rituals will be performed when Shraddha in 2017 commences. We will pray for the departed souls to rest in peace during the Shradh in 2017 .

Before we go ahead and pray for the peace of our ancestors and the dead, let’s find out the significance of Shraddha.

Significance Of Shradh

As per the holy scripture ‘Srimad Bhagavad Gita’, the body is destructible but the soul remains immortal. The soul never takes birth neither it dies. The soul is immortal and ever existent. Hence neither air, water nor fire can destroy it.

The time of Shraadh liberates the soul from the cycle of life and death resulting in salvation. Hence, performing Shraddh during the time of Pitru Paksha is considered extremely important for the departed souls to rest in peace. Tarpan, during the time of Shradh, is equally necessary in order to get rid of Pitra Dosh (bad effects due to the non-performance of rituals of the departed souls). Let’s pray for the peace of the departed souls with full faith and devotion during the days of Shraddh in 2017.

The ritual of performing Shraddh frees the departed soul. Read on to know more about the Shraddha dates in 2017.

Shradh Dates In 2017

Every year during the time of Shraadh, various Hindu families pray for their ancestors to rest in peace. During these sixteen days of Shraddh, each day is dedicated as Tithi (date) of an ancestor. The Tithi on which the Shradh takes place is considered to be the date on which the person has passed away. Hence, based on that Tithi, prayers are offered for the peace of the departed soul. If a person passed away on the day of Saptami, his Tarpan would be performed on Saptami Shraadh. The last day of Shradh that is Amavasya is the day when we pray to God that all the departed souls rest in peace and may find the place in heaven. This time during Pitra Paksha of Shraadh in 2017, let’s pray for the peace of the departed souls.

The dates of Shraddh in 2017 are as follows:

Date Date Shradh Significance
September 5 Tuesday Purnima Shraddha On this day of Shraddh, Tarpan is performed for those who left this world on Purnima.
September 6 Wednesday Pratipada Shraddha This is performed for the people who died on Pratipada Tithi.
September 7 Thursday Dwitiya Shraddha This day the Tarpan takes place for the people who passed away on Dwitiya Tithi.
September 8 Friday Tritiya Shraddha This is performed for the people who departed from earth on Tritiya Tithi.
September 9 Saturday Chaturthi Shraddha We perform Shraddh on this day for the people who got heavenly aboard on Chaturthi Tithi.
September 10 Sunday Maha Bharani, Panchami Shraddha This Shraddha is performed when the Bharani Nakshatra prevails during the time of Pitru Paksha. Bharani constellation either prevails on Chaturthi or Panchami every year. Panchami Shradh is special as Tarpan takes place for the people who died unmarried. Tarpan or pind daan performed on this day is equivalent to the Gaya Shraddha.
September 11 Monday Shashthi Shraddha This day the Tarpan will take place for the people who passed away on Shashthi Tithi.
September 12 Tuesday Saptami Shraddha The Shraddh is performed for the people who passed away on Saptami Tithi.
September 13 Wednesday Ashtami Shraddha This day is observed as Shraddh for people who passed away on Ashtami Tithi.
September 14 Thursday Navami Shraddha Shraddh is performed for the people who passed away on Navami Tithi. On this Tithi men perform the Shraddh for their wives. Pind Daan or Tarpan takes place for the mother that is why it is also named as Matra Navami.
September 15 Friday Dashami Shraddha This day the Tarpan takes place for the people who passed away on Dashami Tithi.
September 16 Saturday Ekadashi Shraddha This Shraddh is performed for people who passed away on Ekadasi Tithi.
September 17 Sunday Dwadashi Shraddha, Trayodashi Shraddha Shraddh on dwadashi tithi is performed for people who have taken up Sanyas or renunciation before death. The Shradh on Trayodashi tithi is observed for the peace of dead children and people who passed away on Trayodashi Tithi.
September 18 Monday Magha Shraddha, Chaturdashi Shraddha It is also known as Magha Shraddh as it is performed when Magha Nakshatra (constellation) prevails during Aparahana Kaal. On Chaturdashi Tithi, Tarpan is performed for the persons who have died an unnatural death (accident, murder or suicide).
September 19 Tuesday Sarva Pitru Amavasya This Tithi is performed for all ancestors, irrespective of the way they died. If somebody is not able to perform Shraddha on the requisite Tithi, may perform on Sarvapitri Moksha Amavasya Shradh.

 

On the Tithi of Amavasya, the families ask for the blessings of their ancestors. On the Amavasya Shradh, in the evening, a special (Atta or flour) Diya is lighted. This lighting of Diya signifies Pitru Vidaai (final goodbye) to the departed souls. During this time, it is believed that post the rituals of the Shradh, their souls would rest in peace. Every Tithi of Shraddh is the day to pray for the peace of the departed souls, as each day is different from the other as per the Tithi of the departed soul. On this Shradh in 2017, pray for the dead so that their souls rest in peace.

During the time of Shradh, certain important rituals are performed as a gratitude toward the departed souls.

Let’s discuss the significance of performing rituals during the Pitra Paksha for our ancestors, before practicing them in 2017.

Rituals Of Shradh In 2017

During the time of Shraddha, we pray to your ancestors that their souls rest in peace. There are certain rituals which are performed during the Pitru Paksha Shradh. It is believed that if these rituals are performed with full faith, devotion, and respect, the departed souls will rest in peace and they will protect us from all the negatives and evils.

The rituals of Shraddh are as follows:

  1. It is believed that Shraadh of any ancestor or any departed soul in the family should be performed by any male member. It could either be the eldest son of the departed soul or the head of the family.
  2. During the time of Shraddh, one should pray religiously and control one’s anger.
  3. On the various Tithi of Shraadh, Brahmins are invited at home and special prayers (Tarpan) are offered to the departed souls.
  4. Post the ritual of Tarpan, Brahmins are offered home cooked food, brand new clothes, special sweets and Dakshina (money). This offering has a special reason in the Hindu mythology. It is a belief that this Brahman Bhoj reaches the ancestors.
  5. Along with the Brahmins, crow is also fed with the same food, as crow is believed to be the messenger from Yama. Along with the crow, dog and cow are also fed.
  6. During the time of Shraadh, one can make Mahadan (big donation). This ritual is performed in order to free oneself from the Pitra Dosha. It brings positivity along with the blessings of the departed soul. Some of the items of the Mahadaan are:
  • Ghee (purified butter)
  • Rice
  • Gangajal (water of river Ganga)
  • Mustard Oil
  • Wheat
  • Salt
  • Steel utensils
  • Shoes, socks or chappals
  • Clothes (towels, Lungi, kurta)
  • Fruits
  • Vegetables
  • Kali Til (sesame seed) and milk

This Shraadh in 2017 when you make Tarpan along with these rituals, pray for the peace of the departed soul. Before this Shraddha in 2017, let’s know the legend associated with the concept of Shraddh.

Legend Of Shradh

Shraddha in Pitru Paksha is the time to remember, thank and honor our ancestors. The relevance of Shradh can be best known from one of the greatest epic of all time Mahabharata.

Post the war between the Kauravas and Pandavas, when everything ended, Karan (Danveer Karna, one of the greatest legends in the war of Mahabharata) died and reached heaven, he was offered food in the form of gold and silver. On this, he questioned Indra the reason for offering him such a food. On this, Indra told Karna that throughout his life donated gold, diamond and silver, but, never donated any food in the name of his ancestors. Karna reverted that as he was not aware about his ancestors; hence, he never did it. So, Indra asked Karna to come back to earth, where he donated food, made Tarpan during the sixteen days.

It is believed that during the time of Shraddh, ancestors come to earth to bless their kin. Hence, during the time of Shraddh, it is important to make the Tarpan in order to get rid of Pitru Dosha. Remember the ritual of Tarpan (offering food, water) during the Shraddh in 2017.

As per the Hindu mythology, there are some important places in India for performing the rituals of Shraadh for the departed souls to stay in peace and be happy.

Holy Places For Shradh Rituals

It is believed that if you perform Shradh rituals at specified holy places, the departed souls stay happy and their souls get liberated.

The places that are best suitable to perform Shraadh rituals are mentioned below. This 2017 also, go ahead and perform Shradh for your ancestors:

  • Varanasi
  • Prayaga
  • Gaya
  • Kedarnath
  • Badrinath
  • Rameswaram
  • Nasik
  • Kapal mochan Sesh Ambadi

So, do not miss out to perform the rituals of Shradh by offering a thankful tribute to the departed souls at these holy places in 2017.

During the time of Pitru Paksha, there are certain things which should be avoided while performing Tarpan.

Things To Be Avoided During Pitru Paksha

During Shraadh, try to restrain yourself from doing all the things mentioned below:

  1. Avoid buying any new clothes during the time of Pitru Paksha.
  2. Any auspicious event like marriage, or birth ceremony is completely prohibited during the time of Shraadh.
  3. Try to avoid having a haircut during the sixteen days of Shradh.
  4. Restrain from eating non vegetarian food, alcohol and tobacco during the time of Shraadh.
  5. Try to avoid eating at others’ house during the time of Shraadh. It is considered that if you eat (salt debt) at someone’s home their Pitru is transferred to the host. This can only be removed by balancing the act or through a remedial Pooja.

Hence, try to avoid all the above mentioned things on Shradh in 2017.

Ohh! departed souls and ancestors,
May your souls rest in peace.
These sixteen days of Shradh in 2017,
We pray for your blessings and kindly remove our sins.
We will make you happy by performing Tarpan and making Brahmin Bhoj.
Protect us and remove our Pitru Dosh.

Happy Shrawan Mass – Yesmywish.com !

इस वर्ष भगवान शिव के प्रिय मास सावन में 50 वर्षों के पश्चात विशेष संयोग बन रहा है। विशेष यह कि सोमवार से ही इस माह का आरंभ हो रहा है और समापन भी सोमवार को ही होगा। इस कारण यह माह विशेष रूप से शुभ फलदायक है। 10 जुलाई से सावन की शुरुआत होगी और 7 अगस्त को रक्षाबंधन का पर्व अर्थात सावन पूर्णिमा है।
कई वर्ष पश्चात इस बार सावन मास में पांच सोमवार है। साथ ही यह भी विशेष है कि वैधृति योग के साथ सावन प्रारंभ हो रहा है और आयुष्मान योग के साथ इस मास की समाप्ति। सोमवार, सावन मास, वैधृति योग व आयुष्मान योग इन सभी के स्वामी स्वत: प्रभु शिव ही हैं इसी लिए इस बार का सावन विशेष है। पुराणों के अनुसार सावन में भोले शंकर की पूजा,अभिषेक,शिव स्तुति एवं मंत्र जाप का अपना विशेष महत्व है। विशेष रूप से सोमवार के दिन महादेव की आराधना से शिव एवं शक्ति दोनों प्रसन्न होते हैं। इनकी कृपा से दैविक, दैहिक और भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। निर्धन को धन की और नि:संतान को संतान की प्राप्ति होती है, कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। भोलेनाथ की पूजा से मनुष्य काभाग्य पलट सकता है।
सावन मास में प्रत्येक सोमवार का विशेष महत्व होता है।
सामान्यतः सावन में चार सोमवार ही होते हैं परन्तु इस वर्ष पांच सोमवार हैं और सभी सोमवारों की पूजा के लिए भिन्न भिन्न मंत्रों विधान हैं।
नियमपूर्वक पूजा करने से औघड़दानी महादेव की कृपा सदैव ही भक्तों पर बनी रहती है।
1. प्रथम सोमवार दिनांक 10/7 को महामायाधारी महादेव का पूजन :- सावन के प्रथम सोमवार को महामायाधारी प्भु शिव की आराधना की जाती है। पूजा-अर्चना के पश्चात शिव भक्तों को
मंत्र ‘ऊं लक्ष्मी प्रदाय ह्री ऋण मोचने श्री देहि-देहि शिवाय नम:’
मंत्र 11 माला जाप करना चाहिए। इस मंत्र के जाप से लक्ष्मी की प्राप्ति, व्यापार में वृद्धि एवं ऋण से मुक्ति मिलती है।
2. द्वितीय सोमवार को महाकालेश्वर महादेव की पूजा करने का विधान है। भक्तजनों मंत्र🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌
‘ऊं महाशिवाय वरदाय हीं ऐं काम्य सिद्धि रुद्राय नम:’
मंत्र का कम से कम 11 माला जाप करना चाहिए। महाकालेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना से मनुष्य को सुखी गृहस्थ जीवन, पारिवारिक कलह से मुक्ति, पितृ दोष एवं तांत्रिक दोषों से मुक्ति मिलती है।
3. तृतीय सोमवार को अर्द्धनारीश्वर महादेव की पूजा-अर्चना का विधान है। इन्हें प्रसन्न करने के लिए
मंत्र 🙌 ॐमहादेवाय सर्व कार्य सिद्धि देहि-देहि कामेश्वराय नम:’
मंत्र का 11 माला जाप करना श्रेष्ठ माना गया है। इनकी कृपा से भक्तों को अखंड सौभाग्य, पूर्ण आयु, संतान प्राप्ति, संतान की सुरक्षा, कन्या विवाह, अकाल मृत्यु निवारण व आकस्मिक धन की प्राप्ति होती है।
4. चतुर्थ सोमवार को तंत्रेश्वर शिव की आराधना करने का विधान है। इस दिन कुश के आसन पर बैठकर
मंत्र 🙌 ‘ऊं रुद्राय शत्रु संहाराय क्लीं कार्य सिद्धये महादेवाय फट्’
मंत्र का 11 माला का जप शिवभक्तों को करना चाहिए। तंत्रेश्वर शिव की कृपा से भक्त को समस्त बाधाओं का नाश, अकाल मृत्यु से रक्षा, रोग से मुक्ति व सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
5. पांचवें सोमवार को महादेव के त्रयम्बकेश्वर स्वरुप की पूजा की जाती है। किसी कारणवश अगर कोई भक्त सावन में चारों सोमवार ही देवाधिदेव की पूजा-अर्चना नहीं कर पाएं तो उन्हें पांचवें सोमवार पर ही महादेव की पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती है। इसमें रुद्राभिषेक,लघु रुद्री, मृत्युंजय अथवा लघु मृत्युंजय का जाप करना चाहिए।
अब हम देवाधिदेव के पूजन की विधि के विषय में बता रहे हैं जो निम्नलिखित है :-
दगंगा जल, दूध, शहद, घी,शर्करा व पंचामृत से भोले बाबा का अभिषेक कर वस्त्र, यज्ञोपवित्र, श्वेत एवं रक्त चंदन भस्म, श्वेत मदार, कनेर, बेला, गुलाब पुष्प, बिल्वपत्र, धतुरा, बेल फल, भांग आदि चढ़ायें। इसके पश्चात घी का दीपक उत्तर दिशा में जलाएं। पूजा करने के बाद आरती कर देवाधिदेव से क्षमार्चन करें।
10 जुलाई : प्रथम सोमवार
17 जुलाई : द्वितीय सोमवार
24 जुलाई : तृतीय सोमवार
31 जुलाई : चतुर्थ सोमवार
07 अगस्त: पंचम सोमवार

This Sharawan Maas perform Shiv Puja and Hawan !

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Make a wish to Lord Shiva and he will grant it to you.

Dhanyawaad,

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Guru Purnima Celebration 2017 A Day of the Master www.yesmywish.com

Today is the appearance day of Srila Vyasadeva, or VedaVyasa, who composed the major portion of Vedic literature.

Today we are celebrating Guru-puja, because we are very indebted to our Gurudeva, the guru-parampara and Srila Vyasadeva. In India, all the various sampradayas –Vaisnava and Mayavadi as well – accept Sri Vyasadeva as Guru, and all worship him on the day of Guru-puja without hesitation.

“This Srimad-Bhagavatam is the literary incarnation of God, and it is compiled by Srila Vyasadeva, the incarnation of God. It is meant for the ultimate good of all people, and it is all-successful, all-blissful and all-perfect.”

This is a day of remembrance of all gurus, through whom God grants the Divine grace of Spiritual knowledge to His disciples.

Guru Purnima is an opportunity for disciples to recommit themselves to following their Guru’s guidance and teachings.

Sri Guru Mantra

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुर्साक्षात्‍ परब्रह्म तस्मै श्री गुरवेनमः॥

Adi Guru

Ascetics distance
The stoic stance

All this they bore
And He could not ignore

Seekers so intense
Broke his obstinate stance

Celestial sages seven
Strived not in search of Heaven

But to find a way for every human
To find a way beyond hell and heaven

They toiled for their race
He could not withhold his Grace

He turned his sacred face
To south to look upon their race

They not only beheld his divine face
But held the downpour of ultimate Grace

As the Beginningless One flowed
In knowing, seven sages overflowed

To release the world
From its crusted mold

To this day the sacred knowing flows
We will not rest until every vermin knows

Thanks

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Lord Hanuman Jayanthi Special Yesmywish.com

Shree Hanuman Jayanti

Hanuman Jayanti was celebrated yesterday with devotion and religious fervor. Hanuman temples were decorated with flowers and colorful lights all over the country. Bhajans and Kirtans to celebrate Shree Hanumanji’s birthday were also organised in many places.

What is the importance of Shree Hanuman in the Hindu Religion? Why do so many people worship Shree Hanuman so ardently? They even observe a fast and eat only once in the evening and that too only sweet food, no salt.

Shree Hanuman is known for his devotion towards Lord Ram. His selfless love and comitment to serve Lord Ram empowers him to achieve anything that may be required to serve his Lord. It is this unique power that enables him to fly to the far off mountains to bring the rare herb that is needed to revive Lakshman.

Jai Bajrang Bali
Lord Bajrang Bali symbolizes strength and unparalleled devotion and selfless service. He is the greatest devotee of Lord Bajrang Bali and he is a Brahmachari (celibate) and humility is his hallmark.

The greatness of Hanuman is explained by Lord Ram in the Ramayan

Lord Ram said to Hanuman, ‘I am greatly indebted to you, O mighty hero. You did marvelous, superhuman deeds. You do not want anything in return. … you have not asked for anything at any time. You threw away the precious garland of pearls given to you by Sita.
How can I repay my debt of gratitude to you? I will always remain deeply indebted to you.
I give you the boon of everlasting life. All will honor and worship you like myself. Your idol will be placed at the door of my temple and you will be worshipped and honored first. Whenever my stories are recited or glories sung, your glory will be sung before mine. You will be able to do anything, even that which I will not be able to!’